24 अक्टूबर 2025 को समस्तीपुर की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार चुनावी अभियान की शुरुआत जोरदार हमले के साथ की। मंच से उन्होंने विपक्षी दलों पर तीखा प्रहार करते हुए कहा-“ये लठबंधन वाले जिन गानों पर प्रचार कर रहे हैं, उनमें सिर्फ छर्रा, कट्टा और धमकी की भाषा है। ऐसे गाने सुनकर जंगलराज की याद आ जाती है।” उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तुरंत वायरल हुआ और राजनीतिक हलकों में नई बहस छिड़ गई। पीएम का इशारा उन भोजपुरी और मगही गानों की ओर था जो इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब चल रहे हैं और जिनमें खुले तौर पर RJD का समर्थन दिखता है। बीजेपी और जदयू ने इन गानों को मुद्दा बनाते हुए कहा कि “महागठबंधन सत्ता में आने से पहले ही डर और दबाव की भाषा बोल रहा है।” वहीं, RJD ने सफाई दी कि ये गाने पार्टी के आधिकारिक नहीं हैं और न ही इन्हें उनके कार्यकर्ताओं ने बनाया है। इसके बावजूद बीजेपी नेताओं ने इस बहाने “जंगलराज की वापसी” का मुद्दा फिर से जिंदा कर दिया है।
‘भैया के आवे दे सत्ता में…’ से लेकर ‘RJD सरकार बनतो यादव रंगदार बनतो’ तक – चुनावी म्यूजिक की आग
बिहार में इस चुनावी मौसम में भोजपुरी और मगही गानों का असर जबरदस्त है। कई सिंगर जैसे गांधी लाल यादव, मिथिलेश हलचल, अमित आशिक और रौशन रोही ने RJD समर्थक गीत जारी किए हैं, जो सीधे राजनीतिक नारे बन चुके हैं। गांधी लाल यादव का गाना “भैया के आवे दे सत्ता में, उठा लेबौ घर से रे…” सबसे ज्यादा विवादों में है। इसे बीजेपी ने सीधा ‘धमकी भरा प्रचार’ बताया है। वहीं, मिथिलेश हलचल का “लालू जी के लालटेन, तेजस्वी जी के तेल…” और रौशन रोही का “बन जो छौड़ी तेजस्वी यादव के जान…” जैसे गीत भी वायरल हैं। ये गाने RJD समर्थक इलाकों में खूब बज रहे हैं और सोशल मीडिया पर लाखों व्यूज बटोर चुके हैं। भोजपुरी स्टार खेसारी लाल यादव का “अहिरान” और “तेजस्वी के बिना सुधार ना होई” जैसे गीत भी पार्टी के माहौल को और गर्मा रहे हैं। दिलचस्प यह है कि खेसारी खुद RJD उम्मीदवार के रूप में छपरा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं, जिससे इन गानों की राजनीतिक अहमियत और बढ़ जाती है। इसके अलावा, जनसुराज और बीजेपी ने भी अपने समर्थक गीत जारी किए हैं-जैसे निरहुआ का “आया है युग उत्थान का” और रितेश पांडेय का “हर घर के आवाज बड़ुए, आवे वाला जनसुराज बड़ुए।” हालांकि इन गानों में भड़काऊ या जातीय भाषा का प्रयोग नहीं है, इसलिए उन्हें उतनी आलोचना नहीं झेलनी पड़ी।
क्या गानों से बदल सकता है चुनावी समीकरण? एक्सपर्ट्स की राय और राजनीतिक गणित
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पीएम मोदी द्वारा इन गानों का मुद्दा उठाना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। वरिष्ठ विश्लेषक अरविंद मोहन का मानना है कि बीजेपी बिहार में वही कार्ड खेल रही है जो उसने 2022 के यूपी चुनाव में खेला था। उन्होंने कहा, “जब यूपी में अखिलेश यादव के समर्थक बाहुबल और जातीय वर्चस्व के प्रतीक गाने चला रहे थे, तब बीजेपी ने ‘कानून-व्यवस्था’ और ‘जंगलराज’ की थीम को भुनाया और इसका उसे फायदा भी मिला।” मोहन के मुताबिक, “अब बिहार में पीएम मोदी उन गानों को मुद्दा बनाकर पिछड़ी और अगड़ी जातियों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि यादव वोट बैंक के प्रभाव को संतुलित किया जा सके।” वहीं वरिष्ठ पत्रकार गिरिंद्र नाथ झा का मत है कि इन गानों का चुनावी असर सीमित है-“भोजपुरी और मगही गाने लोग मनोरंजन के लिए सुनते हैं। चुनाव में लोग रोजगार, विकास और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर वोट करते हैं, गानों की भाषा पर नहीं।” लेकिन पॉलिटिकल एनालिस्ट संजय सिंह मानते हैं कि यह मुद्दा युवा मतदाताओं को प्रभावित कर सकता है। उनके मुताबिक, “बिहार में करीब 7.42 करोड़ वोटरों में से 24 प्रतिशत यानी लगभग 1.75 करोड़ नए मतदाता हैं, जिन्होंने लालू-राबड़ी शासनकाल नहीं देखा। बीजेपी इस वर्ग को ‘जंगलराज’ की चेतावनी देकर अपनी तरफ मोड़ना चाहती है।” कुल मिलाकर, गानों से निकली यह बहस अब महज संगीत तक सीमित नहीं रही-यह बिहार की सियासत का नया हथियार बन चुकी है। एक ओर बीजेपी इसे अपराध और अव्यवस्था की याद दिलाने का जरिया बता रही है, वहीं RJD इसे युवाओं के जोश और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बता रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता इसे मनोरंजन मानेगी या सत्ता परिवर्तन का संदेश।




