भारतीय वैदिक ज्योतिष में विवाह को केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो आत्माओं का ‘कर्मिक मिलन’ माना जाता है। अक्सर माता-पिता और युवाओं के मन में यह प्रश्न सबसे ऊपर होता है कि “विवाह कब होगा?” ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, हमारे जन्म के समय ग्रहों की जो स्थिति होती है, वही हमारे जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों का समय निर्धारित करती है। विवाह की सटीक भविष्यवाणी के लिए कुंडली के 7वें भाव, शुक्र, बृहस्पति और दशा काल का सूक्ष्म अध्ययन अनिवार्य है।
शादी का समय केवल उम्र पर निर्भर नहीं करता, बल्कि यह इस पर निर्भर करता है कि आपकी कुंडली में “विवाह का योग” कब सक्रिय (Active) हो रहा है।
विवाह के समय को निर्धारित करने वाले प्रमुख कारक
ज्योतिष में विवाह की गणना के लिए तीन मुख्य स्तंभ होते हैं:
- भाव (Houses): 7वां भाव (मुख्य विवाह स्थान), 2वां भाव (कुटुंब/परिवार), और 11वां भाव (इच्छा पूर्ति)।
- ग्रह (Planets): पुरुषों के लिए शुक्र (Venus) और महिलाओं के लिए बृहस्पति (Jupiter) विवाह के नैसर्गिक कारक हैं।
- समय चक्र (Vimshottari Dasha): वह विशेष समय जब विवाह कराने वाले ग्रह की महादशा या अंतर्दशा आती है।
मुख्य सामग्री: विवाह की भविष्यवाणी कैसे की जाती है?
सप्तम भाव (7th House): विवाह का प्रवेश द्वार
कुंडली का सातवां भाव विवाह और जीवनसाथी का घर है।
- यदि सातवें भाव का स्वामी (सप्तमेश) शुभ स्थिति में हो, तो विवाह समय पर और सुखद होता है।
- यदि इस भाव पर शनि या राहु का प्रभाव हो, तो विवाह में देरी या बाधाएं आती हैं।
ग्रहों का गोचर (Transits): जब शहनाई बजने का योग बने
जब गोचर का बृहस्पति (गुरु) आपकी राशि या सातवें भाव को देखता है, तो विवाह के अवसर बनते हैं। गुरु को “आशीर्वाद” का ग्रह माना जाता है, इसके बिना मांगलिक कार्य संपन्न होना कठिन होता है।
विवाह की संभावित आयु के ज्योतिषीय योग
- जल्दी विवाह (21 से 25 वर्ष): यदि 7वें भाव में शुक्र, बुध या चंद्रमा जैसे शुभ ग्रह केंद्र में हों और उन पर कोई पाप प्रभाव न हो।
- सामान्य विवाह (26 से 29 वर्ष): यदि गुरु की स्थिति मजबूत हो और शुक्र मध्यम बल का हो।
- विलंब से विवाह (30 से 35+ वर्ष): यदि 7वें भाव में शनि बैठा हो, या सप्तमेश 6, 8, 12वें भाव में चला गया हो। शनि को ज्योतिष में ‘धीमा’ ग्रह माना जाता है, जो फल देने में देरी करता है।
मांगलिक दोष और विवाह (Manglik Dosha)
मंगल दोष को लेकर समाज में बहुत डर है, लेकिन यह केवल ऊर्जा का एक असंतुलन है। यदि मंगल 1, 4, 7, 8 या 12वें भाव में हो, तो व्यक्ति मांगलिक होता है। यह विवाह में देरी नहीं, बल्कि स्वभाव में उग्रता ला सकता है, जिसे ‘मंगनी’ या ‘शांति पूजा’ से ठीक किया जा सकता है।
विवाह में देरी के आध्यात्मिक और ज्योतिषीय कारण
- पितृ दोष: परिवार के पूर्वजों की अतृप्ति के कारण भी विवाह में बाधाएं आती हैं।
- अष्टम भाव का राहु: यह अचानक बनते हुए रिश्तों को तोड़ देता है।
- नक्षत्र दोष: कुछ नक्षत्र (जैसे मूल या अश्लेषा) में जन्म होने पर शांति पूजा के बिना विवाह में अड़चनें आती हैं।
विवाह की बाधाएं दूर करने के अचूक उपाय
यदि आपकी उम्र बढ़ रही है और रिश्ता तय नहीं हो पा रहा है, तो ये उपाय कारगर सिद्ध हो सकते हैं:
- बृहस्पति देव की सेवा: गुरुवार के दिन पीले वस्त्र पहनें, केले के पेड़ की पूजा करें और चने की दाल का दान करें।
- माँ गौरी की उपासना: कन्याओं को “माँ पार्वती” की पूजा करनी चाहिए। ‘कात्यायनी महामाये…’ मंत्र का जाप शीघ्र विवाह के लिए अमोघ है।
- शुक्र को मजबूत करें: शुक्रवार को सफेद वस्तुओं (दूध, दही, चीनी) का दान करें और परफ्यूम का प्रयोग करें।
- पीपल पर जल: यदि शनि के कारण देरी हो रही है, तो शनिवार को पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाएं और सात परिक्रमा करें।
- बड़ों का सम्मान: घर के बुजुर्गों और गुरुओं का आशीर्वाद ‘विवाह योग’ को जल्दी सक्रिय करता है।
विवाह की भविष्यवाणी का सूक्ष्म आधार: नवांश कुंडली और ग्रहों का खेल
विवाह के समय का सटीक आकलन करने के लिए केवल मुख्य कुंडली (Lagna Chart) पर्याप्त नहीं होती। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नवांश कुंडली (D9 Chart) को विवाह का ‘पॉवर हाउस’ माना जाता है। यदि मुख्य कुंडली में विवाह के योग कमजोर दिख रहे हों, लेकिन नवांश कुंडली में शुक्र या बृहस्पति मजबूत स्थिति में हों, तो संघर्ष के बावजूद विवाह एक सुखद मोड़ पर पहुँच जाता है।
‘विवाह योग’ को सक्रिय करने वाली विशिष्ट दशाएं
विवाह तभी होता है जब ब्रह्मांडीय ऊर्जा आपके पक्ष में होती है। इसे ‘विवाह काल’ (Marriage Period) कहा जाता है।
- सप्तमेश की दशा: जब आपकी कुंडली में 7वें भाव के स्वामी की महादशा या अंतर्दशा आती है, तो विवाह की चर्चाएं घर में तेज हो जाती हैं।
- शुक्र और गुरु का मिलन: गोचर (Transit) में जब गुरु और शुक्र एक-दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में होते हैं, तो यह समय विवाह का प्रस्ताव आने के लिए सबसे शुभ माना जाता है।
- राहु का प्रभाव: आधुनिक ज्योतिष में राहु को ‘अपरंपरागत’ विवाह का कारक माना जाता है। यदि राहु की अंतर्दशा चल रही हो, तो व्यक्ति अक्सर अपनी जाति या परंपरा से बाहर (Inter-caste/Love Marriage) विवाह करता है।
विवाह में देरी के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पहलू
आज के आधुनिक युग में विवाह में देरी केवल ‘दोष’ के कारण नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली के कारण भी है। लेकिन ज्योतिषीय दृष्टि से इसे ‘देश, काल और पात्र’ के सिद्धांत से समझा जाता है।
- करियर की प्राथमिकता: यदि कुंडली में दशम भाव (Career) बहुत प्रबल हो और सप्तम भाव पर शनि की दृष्टि हो, तो व्यक्ति पहले अपनी पहचान बनाने पर ध्यान केंद्रित करता है, जिससे विवाह 30 वर्ष की आयु के बाद ही संभव हो पाता है।
- मांगलिक दोष का मनोवैज्ञानिक प्रभाव: कई बार मांगलिक होने के डर से अच्छे रिश्ते हाथ से निकल जाते हैं। ज्योतिष के अनुसार, 28 वर्ष की आयु के बाद मंगल का ‘उग्र प्रभाव’ स्वतः शांत होने लगता है, इसलिए इसे लेकर अत्यधिक तनाव नहीं पालना चाहिए।
- अनुकूल समय का चयन: अक्सर लोग ‘अशुभ समय’ में रिश्ता तय कर लेते हैं, जिससे बात बनते-बनते बिगड़ जाती है। यदि दशा प्रतिकूल हो, तो उस समय सगाई या पक्की बात करने से बचना चाहिए।
निष्कर्ष (Conclusion)
कुंडली में विवाह का समय एक दिव्य गणना है। ग्रह हमें संकेत देते हैं कि हमारा ‘समय’ कब आ रहा है, लेकिन उस समय का लाभ उठाने के लिए व्यक्ति का सकारात्मक प्रयास और सही निर्णय भी जरूरी है। विवाह केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि दो परिवारों का मेल है, इसलिए कुंडली मिलान के साथ-साथ आपसी समझ (Understanding) को भी महत्व देना चाहिए। सही ज्योतिषीय मार्गदर्शन और उपायों से विवाह की बाधाओं को दूर कर एक सुखी दांपत्य जीवन की शुरुआत की जा सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
हाँ, यदि 5वें भाव (प्रेम) और 7वें भाव (विवाह) के स्वामियों के बीच संबंध बने, तो लव मैरिज के प्रबल योग होते हैं।
7वां भाव खाली होना बुरा नहीं है। ऐसे में उस भाव के स्वामी (Lord) की स्थिति देखी जाती है कि वह कहाँ बैठा है।
कुंडली मिलान केवल गुणों का मेल नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, आयु और मानसिक तालमेल की जांच है। इसे करना सुरक्षात्मक रहता है।
यदि गुरु या शुक्र कमजोर हैं, तो पुखराज या हीरा/ओपल पहनने की सलाह दी जाती है, जो विवाह की ऊर्जा को बढ़ाते हैं।
विंशोत्तरी दशा के साथ ‘नवांश कुंडली’ (D9 Chart) का अध्ययन विवाह की सटीक तारीख और समय बताने का सबसे उत्तम तरीका है।



