श्री कृष्ण आरती का संपूर्ण हिंदी पाठ
नीचे श्री कृष्ण आरती का संपूर्ण हिंदी पाठ Lyrics के साथ दिया गया है, जिसे आप मौन पाठ, उच्चारण अभ्यास या कंठस्थ करने के लिए उपयोग कर सकते हैं।
श्री बाँकेबिहारी तेरी आरती गाऊँ।
कुन्जबिहारी तेरी आरती गाऊँ।
श्री श्यामसुन्दर तेरी आरती गाऊँ।
श्री बाँकेबिहारी तेरी आरती गाऊँ॥
मोर मुकुट प्रभु शीश पे सोहे।
प्यारी बंशी मेरो मन मोहे।
देखि छवि बलिहारी जाऊँ।
श्री बाँकेबिहारी तेरी आरती गाऊँ॥
चरणों से निकली गंगा प्यारी।
जिसने सारी दुनिया तारी।
मैं उन चरणों के दर्शन पाऊँ।
श्री बाँकेबिहारी तेरी आरती गाऊँ॥
दास अनाथ के नाथ आप हो।
दुःख सुख जीवन प्यारे साथ हो।
हरि चरणों में शीश नवाऊँ।
श्री बाँकेबिहारी तेरी आरती गाऊँ॥
श्री हरि दास के प्यारे तुम हो।
मेरे मोहन जीवन धन हो।
देखि युगल छवि बलि-बलि जाऊँ।
श्री बाँकेबिहारी तेरी आरती गाऊँ॥
आरती गाऊँ प्यारे तुमको रिझाऊँ।
हे गिरिधर तेरी आरती गाऊँ।
श्री श्यामसुन्दर तेरी आरती गाऊँ।
श्री बाँकेबिहारी तेरी आरती गाऊँ॥
श्री कृष्ण आरती का सरल अर्थ
आरती- श्री बाँकेबिहारी तेरी आरती गाऊँ। कुन्जबिहारी तेरी आरती गाऊँ। श्री श्यामसुन्दर तेरी आरती गाऊँ॥
अर्थ- हे बांके बिहारी, हे कुंजबिहारी, हे श्याम सुंदर, मैं आपकी आरती गाता हूं।
आरती- मोर मुकुट प्रभु शीश पे सोहे। प्यारी बंशी मेरो मन मोहे। देखि छवि बलिहारी जाऊँ॥
अर्थ- आपके सिर पर मोर मुकुट शोभायमान है, और आपकी प्यारी बांसुरी मेरे मन को मोहित कर देती है। आपकी यह छवि देखकर मैं अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता हूं।
आरती- चरणों से निकली गंगा प्यारी। जिसने सारी दुनिया तारी। मैं उन चरणों के दर्शन पाऊँ॥
अर्थ- आपके चरणों से निकली प्यारी गंगा ने संपूर्ण संसार का उद्धार किया है। मैं उन्हीं पावन चरणों के दर्शन पाना चाहता हूं।
आरती- दास अनाथ के नाथ आप हो। दुःख सुख जीवन प्यारे साथ हो। हरि चरणों में शीश नवाऊँ॥
अर्थ- आप अनाथों के नाथ हैं, और सुख-दुख दोनों में मेरे जीवन के साथी हैं। मैं आपके चरणों में अपना शीश झुकाता हूं।
आरती- श्री हरि दास के प्यारे तुम हो। मेरे मोहन जीवन धन हो। देखि युगल छवि बलि-बलि जाऊँ॥
अर्थ- आप स्वामी हरिदास जी के प्रिय हो, और मेरे मोहन, मेरे जीवन के धन हैं। राधा-कृष्ण की युगल छवि देखकर मैं बार-बार आप पर न्योछावर होता हूं।
आरती- आरती गाऊँ प्यारे तुमको रिझाऊँ। हे गिरिधर तेरी आरती गाऊँ॥
अर्थ- मैं आरती गाकर आपको प्रसन्न करना चाहता हूं। हे गिरिधर (गोवर्धनधारी), मैं आपकी आरती गाता हूं।
श्री कृष्ण आरती का पाठ सुनें (वीडियो)
यदि आप पढ़ने के साथ-साथ कृष्ण आरती को सुनकर भी पाठ करना चाहते हैं, तो नीचे एक वीडियो दिया गया है जिसमें भावपूर्ण धुन के साथ यह चालीसा प्रस्तुत की गई है। जन्माष्टमी की पूजा में इसे बजाकर परिवार के साथ सुना और गाया जा सकता है।
श्री कृष्ण आरती पढ़ने की सही विधि
- आरती की थाली सजाएं
घी या तेल का दीपक, फूल, अक्षत और कपूर रखकर थाली तैयार करें। - बांके बिहारी जी की मूर्ति के सामने खड़े हों
भगवान की मूर्ति या चित्र के सामने स्थिर होकर खड़े हों। - दीप को घुमाते हुए गाएं
आरती की थाली को धीरे-धीरे गोलाकार घुमाते हुए पूरे भाव के साथ आरती गाएं। - मंजीरा या घंटी का प्रयोग करें
कई मंदिरों में आरती के साथ मंजीरा या घंटी बजाने की परंपरा है। - माखन-मिश्री का भोग अर्पित करें
आरती के बाद भगवान को भोग अर्पित करें और प्रसाद बांटें।
श्री कृष्ण आरती कब पढ़ा जाता है?
यह आरती दिन में किसी भी समय की जा सकती है, परंतु परंपरागत रूप से इसे सुबह और शाम की संध्या आरती के समय गाया जाता है। जन्माष्टमी और कृष्ण मंदिरों में होने वाली नियमित संध्या आरती में इसे विशेष श्रद्धा से गाया जाता है। घर में पूजा के समापन पर भी इसे गाना प्रचलित है, विशेषकर बुधवार के दिन जो भगवान कृष्ण को समर्पित माना जाता है। समय से अधिक महत्वपूर्ण भाव और श्रद्धा के साथ गाना माना जाता है।
श्री कृष्ण आरती का पाठ करने के लाभ
पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धापूर्वक यह आरती गाने से सबसे पहला अनुभव मन में प्रेम और भक्ति भाव के गहराने के रूप में सामने आता है, क्योंकि इसकी मधुर धुन और भावपूर्ण शब्द स्वाभाविक रूप से हृदय को छू जाते हैं। इसके साथ ही, यह पूजा को एक पूर्णता का भाव देती है, जिससे भक्त को आध्यात्मिक संतोष का अनुभव होता है।
नियमित रूप से इसे गाने से घर के वातावरण में सामंजस्य और सकारात्मकता बनी रहती है, ऐसा पारंपरिक विश्वास प्रचलित है। साथ ही, परिवार के साथ मिलकर आरती गाना आपसी जुड़ाव और सामूहिक भक्ति भाव को भी सुदृढ़ करता है। अंततः, यह आरती भगवान बांके बिहारी के प्रति श्रद्धा और समर्पण को व्यक्त करने का एक सरल किंतु गहरा प्रभावशाली माध्यम मानी जाती है।
श्री कृष्ण आरती से जुड़े सामान्य सवाल
“बांके” का अर्थ है त्रिभंग (तीन जगह से मुड़ी हुई) मुद्रा, और “बिहारी” का अर्थ है विहार करने वाले। यह भगवान कृष्ण के वृंदावन में विराजमान विशेष स्वरूप को दर्शाता है।
यह आरती वृंदावन के प्रसिद्ध श्री बांके बिहारी मंदिर से विशेष रूप से जुड़ी है, जहां इसे प्रतिदिन संध्या आरती में गाया जाता है।
हाँ, “आरती कुंज बिहारी की” जैसी अन्य लोकप्रिय आरतियां भी हैं; प्रत्येक आरती की धुन और शब्द अलग हैं, परंतु उद्देश्य भगवान कृष्ण की भक्ति ही है।
नहीं, दीपक और श्रद्धा ही पर्याप्त मानी जाती है; फूल, मंजीरा और भोग पूजा को समृद्ध बनाते हैं परंतु अनिवार्य नहीं हैं।
हाँ, कई भक्त कृष्ण चालीसा के पाठ के बाद इस आरती से पूजा का समापन करना पसंद करते हैं।



